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अभिभावक कर्म /मातृ – पितृ कर्म

by | जून 24, 2018 | अवर्गीकृत, अवर्गीकृत

प्रश्न:

मैं अमेरिका में रहता हूँ। मेरे माता-पिता वृद्ध हैं और भारत में अकेले रहते हैं। मैं चाहता हूँ कि वे यहाँ आकर मेरे पास रहें। परंतु उन्हें यहाँ रहना पसंद नहीं है। वे वृद्ध हैं और काफी परेशानी में हैं। मैं अपने परिवार को छोड़ कर उनकी सेवा करने नहीं जा सकता हूँ। वृद्धावस्था में माता-पिता के दुःख-दर्द को देखकर मेरा दिल परेशान है। मैं कैसे अपने दिल को समझाऊँ? भारत में मेरे भाई-बंधु और सगे सम्बन्धी भी उनकी देखभाल ठीक से नहीं कर रहे हैं। कृपया मेरी मदद कीजिये।

उत्तर:

प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों से बंधा है और उसे उनका सामना करना ही है। कर्म कई प्रकार के होते हैं। उनमें से एक है – भूमि कर्म। आपका भूमि कर्म अमेरिका से है, इसलिए चाहते हुए भी आप इस देश को नहीं छोड़ पा रहे हैं। पारिवारिक उत्तरदायित्व आपको जकड़े हुए हैं।

इसी प्रकार आपके माता-पिता का भूमि कर्म उनके जन्मस्थल से जुड़ा है, इसलिए अमेरिका आकर उनका मन अशांत रहता है। यह भूमि कर्म ही आपके और उनके बीच की दूरी का कारण है। आप अपनी ओर से उनके लिए जो भी हो सके कीजिये।

सामर्थ्यानुसार जितना हो सके, उनसे मिलने जाइये। उनकी सेवा कीजिये। परन्तु हमेशा याद रखिये कि कर्म की गति बहुत तेज है। कर्म का प्रवाह बहुत शक्तिशाली है। कोई भी कर्म के प्रवाह की दिशा नहीं बदल सकता। जीवन की धारा किसी के हुक्म की गुलाम नहीं है। इसे अपनी इच्छानुसार ढालने की ज़िद्द छोड़ दीजिए।

बेहतर होगा कि आप अपनी ‘इच्छा’ छोड़ दें। जीवन को खुल कर जियें। दोनों बाहें फैलाकर, दोनों हथेलियाँ  खोलकर, परिस्थिति रूपी हवा को अपने सीने पर अनुभव कीजिये। अपनी चिंता भगवान/ ब्रह्माण्ड को समर्पित कर, चिंतामुक्त हो जाइये। जीवनधारा के साथ-साथ उसी की दिशा में बहना शुरू कीजिये, न कि उसे रोकने की कोशिश करें। आपके रोकने से न तो प्रवाह बदलेगा और न ही रुकेगा। प्रवाह के विपरीत तैरने की कोशिश करेंगे तो केवल दर्द, तकलीफ और परेशानी ही हाथ आएगी।

स्मरण रहे कि यदि आज आपके सम्बन्धी आपके माता-पिता का ख्याल नहीं रख पा रहे हैं, तो यह पारिवारिक कर्म का ही खेल है। एक सीमा के आगे आप कुछ नहीं कर सकते। अतः आप अपनी ओर से उन्हें पूरा प्यार दीजिये। उनके आदर्श पुत्र/पुत्री बनकर रहिये। उनका ध्यान रखिये, उन्हें प्यार दीजिये और पूरा सम्मान दीजिये। इससे आगे की हर इच्छा छोड़ दें, जैसे – आपके सगे-सम्बन्धी और मित्र भी ऐसा ही करें। आपकी यह इच्छा ही आपकी परेशानी का मूल कारण है। आपकी और आपके परिवार की सोच में अंतर हो सकता है। उन्हें उनके विचारों और कर्मों के अनुसार चलने की आजादी दीजिये।

हर मनुष्य को अपने माता-पिता का मोह (राग) त्यागना होगा। उनकी पीड़ा का द्वेष त्यागना होगा। प्रत्येक प्राणी अपने कर्मों से बंधा है। उसे उनका सामना करना ही होगा। हम स्वयं को या किसी और को कर्मफल से नहीं बचा सकते।

अंततः फैसला आपको ही करना है। क्या आप चाहते हैं कि आप जिंदगी भर चिंता करें, परेशान रहें? या सामर्थ्यानुसार पूरी कोशिश करके, परिणाम परमात्मा पर छोड़ दें?

सब कुछ हमारी इच्छा से हो, यह इच्छा छोड़ दें। हर परिस्थिति में सुख और शांति को अपने आप में ही तलाशिये। वो आपके मन में ही है और वहीं मिलेगी। सुखी भव!

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