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प्रश्न:

 

दमन और समर्पण में क्या अंतर है?

 

उत्तर:

 

दमन ज्वालामुखी की तरह होता है। जैसे ज्वालामुखी में आग छुपी होती है, वैसे दमन में नापसंदगी और घृणा छुपी होती है। वो अंदर ही अंदर आपको जलाती है। वो कभी भी फूट सकती है। 

 

दमन का तात्पर्य है, सीमा के बाहर सहन करना। ये अस्थायी उपाय है। 

 

दमन दोगुना नुकसान करता है। कैसे?

 

  • आप नापसंदगी को अपने अंदर से निकालने की कोशिश नहीं करते, केवल दमन करते हैं। 
  • इसका नतीजा यह होता है कि आपके अन्दर कड़वापन जन्म लेने लगता है। और आप सख्त इंसान बन जाते हैं।
  • सख़्त इंसान कभी खुश नहीं हो पाता। जीवन दुखद होने लगता है।

 

पहचानने की कोशिश करें कि नापसंदगी आपको जला रही है। एक बेहद अग्नि निरंतर आपके भीतर जल रही है। इसे जलने देना समझदारी नहीं कहलाती।

 

समझदारी का रास्ता कौन सा है? 

 

समर्पण का रास्ता बेहतर रास्ता है। समर्पण के मार्ग पर दो कदम होते हैं-

  1. पुरुषार्थ- स्वयं का प्रयत्न
  2. समर्पण

 

उदाहरण – यदि आप कठिन परिस्थिति में हों या कठिन इंसान के साथ हों, आप अपनी पूरी कोशिश कीजिए सुधार लाने की और उसके बाद समर्पण कर दें! 

 

समर्पण क्या है?

 

समर्पण पराजय नहीं है। ये दिमाग की जिद्द को छोड़ने का एक उपाय है। 

समर्पण इस बात की याद दिलाता है कि एक परम शक्ति है जो सब वस्तुओं और लोगों का ख्याल रख रही है। समर्पण अहंकार से मुक्ति दिलाता है और साथ ही उस परम शक्ति की पहचान कराता है। पूरे मन से अपना काम करें और कर्मफल को उस परम शक्ति पर समर्पित कर दें।

 

 क्या समर्पित करें?

 

  • आशा, अपेक्षा, क्रोध, नफरत, लालच, जलन का समर्पण करें।
  • निरंतर सोचने की आदत का समर्पण करें।
  • कर्म के फल की कामना का समर्पण करें।
  • भविष्य की चिंता का समर्पण करें।
  • भूतकाल के दुःख का समर्पण करें।

 

कर्म के फल की चिंता ना करें। और शत प्रतिशत कर्म में मन लगाएँ। समर्पण का मतलब है वर्तमान पल मे रहना। केवल समर्पण से ही मन की शांति पाई जा सकती है, दमन से नहीं। क्या आप समझ रहे हैं?

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