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प्रश्न –

 

कभी-कभी मैं सोचता हूँ कि क्या मैं इस सुन्दर और सर्वोच्च ज्ञान के योग्य हूँ? इस ज्ञान को अनेक बार पढ़ने और लागू करने के बाद भी मैं कभी-कभी राग-द्वेष, इच्छाओं और ज्ञानेन्द्रियों में खो जाता हूँ। तब मुझे ऐसा लगता है कि क्या मैं इस ज्ञान के योग्य हूँ या नहीं?

 

उत्तर-

 

हाँ, बिलकुल आप इस ज्ञान के लिए पूरी तरह से योग्य हैं।

 

विश्व की जनसंख्या सात अरब है। 

  • सात अरब में केवल कुछ ही लोग अध्यात्म मार्ग पर आने के बारे में सोचते हैं। 
  • इनमें से कुछ ही हैं जो इस मार्ग पर सच्ची निष्ठा से लगातार चलते रहते हैं। 
  • इनमें से कुछ ही पूरी लगन से स्वयं के प्रकाश को पहचानने की कोशिश करते हैं। 
  • और इन में से कुछ गिने चुने लोग ही मोक्ष प्राप्त कर पाते हैं।

 

आप काफी दूर तक आए हैं। अब जो आप इस आखिरी पड़ाव पर हैं तो रुके नहीं, पीछे ना देखें, और अपने ऊपर संदेह ना करें। इस संदेह को त्यागने का साहस करें।

 

इस आखिरी पड़ाव पर तीन प्रकार के संदेह होते हैं:

  • स्वयं पर संदेह 
  • गुरु पर संदेह 
  • आध्यात्मिक तकनीक पर संदेह 

 

आपको अपने ऊपर संदेह है। इस दलदल से निकलें क्योंकि अगर आप इस दलदल में गहरे चले गए तो इस से निकल नहीं पाएंगे। जान लें कि आप कितने सौभाग्यशाली हैं जो इस आखिरी पड़ाव तक पहुंचे हैं। इस सौभाग्य को ना गवाएँ। 

 

कुछ बातों पर मनन करें:

  • लगन की तीव्रता:  

क्या आप अपने आध्यात्मिक विकास को प्राथमिकता देते हैं? क्या आप अपने परिवार, रिश्ते, पैसा, नौकरी, व्यवसाय, नाम, प्रसिद्धि, सामाजिक जीवन आदि से भी ज्यादा महत्व अध्यात्म को देते हैं?

  • प्रयत्न की प्रामाणिकता:

क्या आप शास्त्रों में दिए गए ज्ञान और स्वाभाविक ज्ञान का सच्चाई से पालन करने का प्रयत्न करते हैं? 

 

ये आध्यात्मिक सीढ़ी के पड़ाव हैं जो आपके मार्गदर्शक बन आपको सर्वोच्च ज्ञान तक ले जाते हैं। 

 

स्वभाव ज्ञान क्या है?

स्वभाव ज्ञान का मतलब है आत्मबोध होना। स्वयं के अंतःकरण का सत्य जान लेना। यह सत्य धीरे-धीरे एक एक करके प्रकट होते हैं। कुछ उदाहरण:

  • शान्ति इसी पल में है, न ही बीते हुए कल में और न ही आने वाले पल में।
  • जीवन में अस्वीकार भाव स्वयं के दुःख निर्माण का कारण है।

 

आध्यात्मिक मार्ग पर चलते चलते जब आप स्वयं की प्रामाणिकता और लगन से ही जीवन के सत्य का अनुभव कर लेते हैं तो यह स्वभाव ज्ञान कहलाता है।

 

जब एक बार स्वभाव ज्ञान हो जाता है तो आप अकेले ही इस मार्ग पर चल सकते हैं। उसे आध्यात्मिक स्वावलम्बन कहते हैं। 

 

आध्यात्मिक स्वावलंबन क्या है? 

जब आपको न किसी शास्त्र ज्ञान की और न ही किसी तकनीक की आवश्यकता होती है। आप उस स्तर पर पहुँच जाते हैं जहाँ आपका चलना भी ध्यान बन जाता है, आपका सांस लेना भी ध्यान बन जाता है, आपका बैठना भी ध्यान बन जाता है और आपका गाना भी ध्यान बन जाता है। तब आप सर्वोच्च पर पहुँच जाते हैं। लेकिन अगर आपको स्वभाव ज्ञान नहीं हुआ है तो आपको गुरु के ज्ञान और शास्त्रों के अनुसार चलना होगा। 

 

और हाँ स्वयं ही अपना आवेदन पत्र न फाड़ें। 

स्वयं पर संदेह कर के आप अपना आध्यात्मिक आवेदन पत्र फाड़ देते हैं। संदेह को त्याग दें। जब आप स्वयं पर संदेह करते हैं तो आप स्वयं अपने मार्ग पर बाधा बन जाते हैं और फिर आप आगे नहीं बढ़ पाते। तो इस सत्य को पहचानें और संदेह को त्याग दें। यह सोच कर अपना आवेदन पत्र ना फाड़ें कि आप इस ज्ञान के योग्य नहीं हैं। बल्कि मेहनत करें और साबित कर दें कि आप पूरी तरह से इस ज्ञान के योग्य हैं।

 

ये भी जान लें कि अगर आप इस सुन्दर ज्ञान के योग्य नहीं होते तो आपको ये ज्ञान मिलता ही नहीं। क्योंकि हमारा कर्म हमारे पास वह नहीं लाएगा जिसके हम योग्य न हों। कर्म पूरी तरह से निष्पक्ष है। आपको वही मिलेगा जिसके आप हकदार हैं। ना एक पाई अधिक और ना एक पाई कम।

 

स्वाध्याय करें! 

कोई आध्यात्मिक प्रश्न है? बाएं साइडबार पर “प्रश्न पूछें” बटन पर क्लिक करके एकता तक पहुंचें। एकता के ऑनलाइन ज्ञान सेशन में भाग लेने के लिए, बाईं ओर स्थित “ज्ञान संघ” बटन पर क्लिक करें।

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