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कर्म से भौतिक जीवन और अध्यात्मिक लक्ष्य दोनों प्रभावित होते हैं ?

by | दिसम्बर 13, 2018 | अवर्गीकृत, अवर्गीकृत

प्रश्न:

हम कहाँ जन्म लेंगे या हम जीवन में क्या व्यवसाय चुनेंगे, इसका चयन हम नहीं कर सकते, परन्तु हम किस से शादी करें और बच्चे हों, इसका चयन कर सकते हैं। जीवन में हम जैसे भी लोगों से मिलते हैं यह हमारे अच्छे या बुरे कर्मों का परिणाम है।

  • यदि मुझे शिक्षा या धनोपार्जन के साधन के चयन पर भी नियंत्रण नहीं है तो मुझे अपने कैरियर के लिए संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है? मैं अपने कैरियर और धनोपार्जन पर ध्यान नहीं दे पा रहा हूँ जबकि मुझे कॉलेज से ही इन दोनों से बहुत लगाव था।
  • यदि गुरू मेरे जीवन में हैं और हर पल मेरे साथ हैं तो मुझे इस अध्यात्म के पथ पर इतना संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है? मेरी साधना और मेरे जीवन साथी व मेरे बच्चों के साथ रिश्ता निभाने में हमेशा द्वंद रहता है। मैं अपने परिवार के साथ रहना चाहता हूँ क्योंकि उन्हें मैंने चुना है और अपने धर्म का निर्वाह करना चाहता हूँ। मैं अपने आध्यात्मिक कर्तव्य नहीं निभा पा रहा, सिवाय प्रतिदिन अभ्यास के और न ही पहले की तरह सेवा कार्य कर पा रहा हूँ। यदि मैं एक को चुनता हूँ तो दूसरा छूट जाता है। मैं अध्यात्म के रास्ते पर चल कर पारिवारिक जीवन में तूफान नहीं लाना चाहता। इसका क्या उपाय है?

उत्तर:

यहाँ एक बात समझने की आवश्यकता है- किसी का दैवं (पुराना कर्म जो आज परिणाम दे रहा है) चाहे कितना भी सुदृढ़ क्यों न हो, पुरुषार्थ अर्थात स्वयं किये गए प्रयत्न से इसे दुर्बल किया जा सकता है। इस प्रकार आपका आज का पुरषार्थ आगे के आगामी कर्म की ओर ले जाता है। यदि अभी आपका पुरुषार्थ राग और द्वेष से परिपूर्ण है तो वही राग-द्वेष आगे भविष्य में फलित होंगें। इसीलिए एक बुद्धिमान व्यक्ति वर्तमान में जैसे ही कोई राग और द्वेष उत्पन्न होता है उससे मुक्त होने के लिए बार-बार प्रयत्न करता है। मैं इसे ज़बरदस्त पुरुषार्थ कहती हूँ (लगातार, निरंतर अभ्यास)।

1क) शिक्षा दैवं है। इसके अनुसार आप इंजीनियर या डॉक्टर बनते हो। परंतु उस दैवं(शिक्षा) को आप कैसे उपयोगी बनाते हो वही पुरषार्थ अर्थात स्वयं के द्वारा किया गया प्रयत्न है। किसी व्यक्ति का पुरुषार्थ उसके दैवं को पराजित कर सकता है। इसलिए इस दिशा में प्रयत्न करते रहिए।

  • कभी भी यह न सोचें ‘ओह मुझे नौकरी नही मिल रही’ या मैं अपनी नौकरी में सफल नहीं हो पा रहा, यह मेरा बुरा कर्म है। कभी भी ऐसे विचारों को मन में घर न करने दें। यह मन की एक चाल है जो आपको प्रयत्न करने से रोकती है। आप मन की अपेक्षा सुदृढ़ रहें और इसके लिए बहुत ज्यादा संयम की आवश्यकता है।
  • सब गतिशील है, सब क्षणिक है। ये पल भी बीत जाएगा क्योंकि जीवन एक बहती नदी के समान है। इसलिए समय के अनुसार चलते रहें, यह तूफान थम जाएगा और नदी का बहाव सामान्य हो जाएगा। मुस्कुराते रहिये। शत प्रतिशत वर्तमान में रहें और इसके साथ चलें।

1ब) धन का स्रोत दैवं है। यह वही दौलत है जिसमें आप जन्म लेते हैं। परन्तु यह आपका पुरुषार्थ है कि आप इस जीवन में कितने धनवान बन जाते हो। यह आपका उत्तरदायित्व है कि बिना राग और द्वेष के कार्य करें क्योंकि यही राग और द्वेष आपके आगामी कर्म होंगें।

2ख) शादी और बच्चे- हर कोई अपने जीवन साथी का चुनाव स्वयं करता है। चाहें माता-पिता की पसंद ही क्यों न हो, अंततः यह निजी पसंद होती है। यह चयन उस व्यक्ति के साथ पुराने कर्मों के कारण होता है। आपके जीवन साथी को आप से मिलना ही था। आप किसी को शादी के लिए चुनो चाहे न चुनो परन्तु अतीत के कर्मों के कारण ही उस व्यक्ति विशेष से मिलते हो और कर्म समाप्त होने तक साथ रहते हो। (हर कर्म की एक निश्चित अवधि होती है।

एक बार जब कोई दंपति मिलता है, उनमें कर्मों का आदान-प्रदान शुरू हो जाता है। इसलिए यदि आपके पति/पत्नी आपका साथ देते हैं तो इसके लिए खुश हो जाएं और यदि आपका साथ नहीं देते तो और अधिक खुश हो जाएं। क्यों? क्योंकि वह आपको कर्मों से छुटकारा दिला रहें हैं, आपके कर्मों के खाते से कर्म घट रहे हैं। इसके साथ आराम से रहें। जल्दी ही नकरात्मक कर्मों का खाता शून्य हो जाएगा। ऐसा होने के लिए धैर्य रखें और किसी प्रकार के राग-द्वेष के द्वारा नये कर्म न बनाएं। नहीं तो इस‌ व्यक्ति विशेष के साथ कर्म इकट्ठे होने लग जायेंगे और यह चक्र ऐसे ही चलता जाएगा। इसलिए इसके प्रति सावधान रहें और अपने अहंकार और इच्छाओं की ओर ध्यान न दें और राग और द्वेष से बचें। अपने आप से कहें ‘सब ठीक है।’ जो जैसा है- है। उसे वैसे ही स्वीकार करें।

2क) अध्यात्मिक प्रगति – इस जीवन में आप अध्यात्म की यात्रा वहीं से शुरू करते हो जहाँ‌‌‌‌ पर पिछले जन्म में छोड़ी थी। निरन्तर ज्ञान में रहना अध्यात्म की प्रगति के लिए अति आवश्यक है। इस सुंदर ज्ञान में रहने का हर संभव प्रयत्न करना चाहिए। यदि आप की परिस्थितियाँ आप को घर से बाहर जाकर सेवा नहीं करने देती हैं तो आप घर/दफ्तर में ही सेवा भाव रखें।

सेवा क्या है?

सेवा समभाव से किया गया कार्य है जिससे कर्म नहीं बनते। यह वास्तव में शुद्ध मानसिक स्थिति है जिससे अध्यात्मिक प्रगति को गति मिलती है। न केवल कार्य करने से बल्कि मन में किसी प्रकार की कोई अपेक्षा नहीं रखने से किसी भी व्यक्ति में बहुत बड़ा आध्यात्मिक बदलाव आता है। बहुत से लोग प्रशंसा की अपेक्षा से सेवा करते हैं, या अहंकार या दिखावे के लिए कार्य करते हैं परन्तु यह सेवा नहीं है। यह एक व्यर्थ कार्य है जो कर्म बनाता है। इसलिए घर और दफ्तर में हर कार्य सेवा भाव से करें। कोई भी कार्य कर्त्तापन के बिना शुद्ध मन से करें, बिना किसी राग-द्वेष के।

चाहे कोई कितना भी व्यस्त क्यों न हो, ज्ञान में रहा जा सकता है। यह प्राचीन ज्ञान पुराने समय में सबके लिए आसानी से उपलब्ध नहीं था परन्तु इस टेक्नोलॉजी के यु्ग में यह वास्तव में हमारे हाथ में ही है। ज्ञान की आग में तपा कर मन को शुद्ध रखें। बाकी सब कुछ सही होगा।

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