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प्रश्न:

क्या कर्म अपनी सोच सकरात्मक रखने के बारे में है या अपनी सोच और विचार निष्पक्ष रखने के बारे में हैं?

उत्तर:

कर्म केवल कुछ कार्य करने से ही नहीं होता है, यह बोलने से और विचारों से भी बन जाता है ,परंतु हर विचार / कर्म / बोल से नहीं।

यदि किसी विचार या बोल के पीछे कोई राग या द्वेष की भावना हो तो आप आगामी कर्म बना लेंगे। तो क्या किया जाये?

१. पहली बात नकारात्मक से सकारात्मक कर्म की ओर बढ़ना। परन्तु सकारात्मक और अच्छे कर्म से घमंड आता है। जिससे नकारात्मकता आती है, इससे बचने के लिए तुरंत दूसरा उपाय करना चाहिए।

२. दूसरा उपाय यह है कि अपने सकारात्मक कर्म को जाने दो (भूल जाओ /छोड़ दो)। अपने अच्छे कार्य का समर्पण कर दो और बदले में क्या चाहिए यह अपेक्षा भी छोड़ दो। यहाँ तक कि कोई आपको धन्यवाद करे, यह अपेक्षा भी जाने दो।

यही तरीका है कि आप अपने कार्य को पवित्र बना सकते हो और आगामी कर्म नहीं बनाते हो! समझ में आया?

प्रश्न:

ऐसी परस्थिति में क्या करें जब हमारी सोच तो सकारात्मक होती है परन्तु फिर भी अंदर कोई अपेक्षा महसूस होती है और कार्य के फल के प्रति लगाव हो जाए? क्या इस तरह से मैं कर्म बना रहा हूँ?

उत्तर:

हर बार जब मन कार्य के फल के पीछे भागे तो कुछ प्राप्त करने के लिए या किसी को पाने की जल्दबाजी होती है और इसी से आगामी कर्म बन जाते हैं। इसीलिए भगवान कृष्ण ने कहा है “कर्म करो, फल की चिंता मत करो!” अर्थात कार्य पर ध्यान दो न कि कार्य के परिणाम पर।


वैसे भी कार्य का परिणाम आपके हाथ में नहीं है। यदि आप इस के पीछे भागते हो, मन में कोई अपेक्षा रखते हो तो आप केवल दुःख ही बढ़ा रहे हो। इसके पीछे भाग कर और मन में यही चलता रहे कि ‘इसे ऐसे ही होना चाहिए’, इसे वैसे नहीं बना देता।

प्रश्न:

किसी उम्मीद को बनाये रखने के लिए यदि कोई कार्य किया जाता है और  फिर इसके परिणाम की अपेक्षा करना कर्म बन जायेगा ऐसा माना जाता है, है न?

उत्तर:

हाँ प्रिय, कुछ प्राप्त करने के लिए उतावलापन, यही तो उम्मीद करना कहलाता है। भविष्य में जीने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि इससे वर्तमान क्षण में कार्य करने की क्षमता चली जाती है।

जैसा परिणाम तुम चाहते हो उस इच्छा को जाने दो। एक बुद्धिमान व्यक्ति 100 प्रतिशत वर्तमान क्षण के कर्म पर ध्यान देता है। वह कर्म के फल को ब्रह्मांड पर छोड़ देता है।

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