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कर्मफ़ल का मोह

by | दिसम्बर 13, 2018 | अवर्गीकृत

प्रश्न: हम अपने आने वाले कोर्स के लिए मेहनत कर रहे हैं। सब लोग कोर्स से होने वाले लाभों को सुन कर बहुत खुश होते हैं लेकिन जब रजिस्टर करने का टाइम आता है तो हमें बोला जाता है कि पैसे नहीं हैं या टाइम नहीं है। ऐसे में निराश होना तो स्वाभाविक है , आशा करना स्वाभाविक है। हम यह करते हैं जानते हुए भी कि आशा करना गलत है। दीदी, आप हमें समझाएँ कि ऐसे में हम क्या करें ?

उत्तर: जब आपको प्यास लगती है तो आप क्या करते हैं रसोई घर में जाते हैं, गिलास उठाते हैं ,और पानी पी लेते हैं ।आप यह नहीं सोचते हैं कि क्या मैं एक पानी का गिलास उठाऊँ या नहीं ,जो स्वाभाविक है। वह आप सहज ही कर देते हैं।
ठीक उसी तरह लोगों को कोर्स के बारे में बताओ उनके साथ अपना अनुभव बाँटो ।यह सब सहायता के भाव से करो। भगवान कृष्ण कहते हैं कर्म करो और कर्म फल की चिंता ना करो अर्थात जो भी करो स्वाभाविकता से करो। कर्म के फल की चिंता ही हममें राग – द्वेष उत्पन्न कर हमें द्वंद में डालती है और इस द्वंद्व के कारण हम किसी भी कार्य को पूर्णता से नहीं कर पाते हैं। अतः स्वाभाविक हो जाना सफलता की कुंजी है। याद रखो जिन लोगों से आज आप आर्ट ऑफ लिविंग के बारे में बात करोगे तो आगे चलकर वो कोर्स कर सकते हैं। आज जो बीज बो रहे हो वह आगे अवश्य अंकुरित होगा। कल को आप बगीचे में खड़े होकर चाहेंगे कि वह आज ही अंकुरित हो तो वह संभव नहीं हो सकता। आप अपना शत प्रतिशत कर्म करें और कर्म फल की चिंता ना करें। काल चक्र को अपना कार्य करने दें।

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