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प्रश्न:
हम अपने आने वाले कोर्स के लिए मेहनत कर रहे हैं। सब लोग कोर्स से होने वाले लाभों को सुन कर बहुत प्रसन्न होते हैं लेकिन जब रजिस्टर करने का समय आता है तो हमें बोला जाता है कि पैसे नहीं हैं या समय नहीं है। ऐसे में निराश होना तो स्वाभाविक है, आशा करना स्वाभाविक है। हम यह जानते हुए भी कि आशा करना गलत है क्योंकि इस से आनंद नहीं मिलता, इस बार आशा है। दीदी, आप हमें समझाएँ कि ऐसे में हम क्या करें?
उत्तर:
जब आपको प्यास लगती है तो आप रसोई घर में जाते हैं, गिलास उठाते हैं, और पानी पी लेते हैं। आप इसके बारे में सोचते नहीं है या तर्क-वितर्क नहीं करते। आप सिर्फ पानी पीते हैं। ठीक उसी तरह लोगों को कोर्स के बारे में बताओ, उनके साथ अपना अनुभव बाँटो, स्वाभाविक होकर कर्म करो।

भगवान कृष्ण कहते हैं कर्म करो और कर्मफल की चिंता ना करो अर्थात जो भी करो स्वाभाविकता से करो। स्वाभाविकता से कर्म करने का अर्थ है कर्म के फल की चिंता नहीं करना।

कर्म के फल की चिंता ही तर्क-वितर्क, प्रेम, ईर्ष्या, चाह- अचाह आदि का कारण है। मन के ऐसे ही विरोधाभास वाले विचारों को अष्टावक्र ने द्वंद कहा है। यह द्वंद आपके कर्म पर प्रभाव डालता है और आप किसी भी कार्य को पूर्णता से नहीं कर पाते हैं। अतः, घर या दफ्तर में जो भी कर्म करें स्वाभाविक होकर करें, इस से आपको ज्यादा सफलता मिलेगी।

याद रखो जिन लोगों से आप आज आर्ट ऑफ लिविंग के बारे में बात करेंगे, आगे चलकर वो कोर्स कर सकते हैं। आज जो बीज बोएंगे वह आगे अवश्य अंकुरित होंगे। भविष्य के बारे में सोचकर आप आगामी कर्म बना रहे हैं। आप बगीचे में बीज बोने वाली जगह के ऊपर खड़े होकर यह नहीं चिल्ला सकते ‘अंकुरित हो, अभी…. अभी…. अभी…. नहीं आप ऐसा नहीं कर सकते।

बिना किसी अपेक्षा के आप अपना शत प्रतिशत देते हुए सिर्फ अपना सुंदर अनुभव बाँटिये और बाकी सब भगवान/ चेतना/ गुरु/ परम शक्ति पर या जिस पर भी आप श्रद्धा रखते हों उस पर छोड़ दीजिए।

हर कर्म का फल उसके समय पर मिलता है। कर्म को अपना काम करने दीजिए, आप बिना किसी मोह के अपना काम कीजिए। इसका मतलब अपना कर्म करने का शत प्रतिशत इरादा रखिये पर कर्म के फल (कर्मफल) से मोह मत रखिये। समझे?

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