Select Page

कर्मफल का मोह कैसे त्यागें?

by | दिसम्बर 13, 2018 | अवर्गीकृत, अवर्गीकृत

प्रश्न: दमन और समर्पण में क्या अंतर है?

उत्तर:

दमन ज्वालामुखी की तरह है। इसमें नापसंदगी छुपी होती है जो अंदर ही अंदर आपको जलाती है और कभी भी फूट सकती है। दमन का तात्पर्य है कि अपनी किसी नापसंदगी को एक सीमा तक सहन किया जाए। लेकिन ये अस्थायी उपाय है, दमन दोगुना नुकसान करता है।

  • आप नापसंदगी को अपने अंदर से निकालने की कोशिश नहीं करते। इसका नतीजा यह होता है कि आपके अन्दर कड़वापन जन्म लेने लगता है और आप सख्त इंसान बन जाते हैं।
  • आप पहचान नहीं पाते कि किस हद तक ये नापसंदगी आपको जला रही है।

इसलिए समझदारी का रास्ता कौन सा है? समर्पण बेहतर रास्ता है। चाहें आप कठिन परिस्थिति में हों या कठिन इंसान के साथ हों, आप अपनी पूरी कोशिश कीजिए सुधार लाने की, साथ ही समर्पण कर दीजिये।

समर्पण क्या है?

समर्पण पराजय नहीं है। ये दिमाग की ज़िद्द को छोड़ने का एक उपाय है। समर्पण इस बात की याद दिलाता है कि एक परम शक्ति है जो सब वस्तुओं और लोगों का ख्याल रख रही है। समर्पण अहंकार से मुक्ति दिलाता है और साथ ही उस परम शक्ति की पहचान कराता है। समर्पण एक पराजय नहीं है। पूरे मन से अपना काम करो और उसका फल (कर्मफलम) उस परम शक्ति पर छोड़ दो।

क्या समर्पित करें?

  • क्रोध, नफरत, लालच, जलन का समर्पण करें।
  • किसी व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में हमेशा सोचते रहने की आदत का समर्पण करें।
  • पूरे मन से कर्म करें, पर कर्म के फल की चिन्ता ना करें। कर्म के फल की कामना का समर्पण करें और शत प्रतिशत कर्म में मन लगाएं।
  • समर्पण का मतलब है वर्तमान पल मे रहना।

केवल समर्पण से ही मन की शांति पाई जा सकती है, दमन से नहीं। क्या आप समझ रहे हैं?

कोई आध्यात्मिक प्रश्न है? बाएं साइडबार पर “प्रश्न पूछें” बटन पर क्लिक करके एकता तक पहुंचें। एकता के ऑनलाइन ज्ञान सेशन में भाग लेने के लिए, बाईं ओर स्थित “ज्ञान संघ” बटन पर क्लिक करें।

0 Comments